जिंदगी बिना प्यार के अधूरी क्यों लगती है ? हर पल किसी अपने का इंतज़ार ये दिल क्यों करता रहता है ? मुझे ही नहीं, हम सभी को अपने उस दोस्त का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता है जो सारे दोस्तों में सबसे ख़ास होता है | जिसके आते ही हमारे चेहरे पर एक ऐसी ख़ुशी छा जाती है जिसका एहसास उन दोनों को हो जाता है| मुझे भी आजकल कुछ ऐसा ही होने लगा है,ये दिल हर पल सिर्फ उसके ही ख्यालों में खोया रहता है | हर घड़ी सिर्फ उसकी ही बातें हमारे दिल को बेचैन किये रहती है | मुझे नहीं पता की वो मुझे प्यार करती भी है नहीं, लेकिन मुझे ऐसा लगने लगा है की मुझे उससे प्यार हो गया है और अगर ऐसा नहीं है तो शायद बहुत जल्दी ही ..................
परिचय
Sunday, February 7, 2010
Monday, January 18, 2010
हिन्दी की कॉपी
हाई स्कूल की कापियां जाँची जा रही थी इलाहाबाद के राजकीय इंटर कालेज में और सभी अपने अपने कम में ब्यस्त थे की अचानक अब्दुल मियाँ (हिंदी के टीचर) की चीखने की आवाज़ आई -
लाहौल बिला कुवत ! क्या वाहियात शक्श है जिसने ये कॉपी लिखी है , अल्ला कसम क्या फ़िल्मी शक्शियत है ?
इतने में पंडित राम शंकर जी बोल पड़े - अमां बड़े मियाँ क्यों खामखाँ फडफदाये जा रहे हो? अमां बच्चे ने ऐसा क्या लिख दिया जो पाजामें से बाहर उछल पड़ रहे हो | क्या भाभी जान ने सुबह सुबह ही बेलन बजा डाला है जो उस बेचारे पर लट्ठ लेकर पिल पड़े हो |
अमे पंडित मियाँ ! अबे तुम क्या जानो इस फ़िल्मी शक्श की कारगुजारियां | अल्लाह बचाए ऐसे बच्चो से | अब्दुल मियाँ ने अपने गुस्से का इज़हार किया |
तभी इत्तफाक से सिंह साहब आ गए | उन्हें इस हंगामे की कोई खबर नहीं थी क्यों कि वो बहार चाय समोसे का आर्डर करने गए थे | आते ही उन्होंने सब को अब्दुला सर के पास खड़े देखा तो लपक कर उनके पास खड़े हो गए और कुछ बोलते इससे पहले ही अब्दुल सर ने अपना मुह खोला और तोप के गोले कि तरह शब्द के गोले दागने लगे | आइये जनाब ! वहीँ क्यों रुक गए | हमारे सिर पर काफी जगह खाली है सीधे उसी पर चढ़ जाते | यहाँ मुह के पास आकर क्यों रुक गए | खुदा झूठ न बुलवाए,तुमलोग बेवजह ही हमारे सिर पर क्यों चढ़े जा रहे हो | अबे हमें कुछ हुआ नहीं है , लेकिन तुम लोग तो हद ही कर दिए हो
सिंह साहब अब्दुल सर के बहुत करीबी दोस्तों में से थे
लाहौल बिला कुवत ! क्या वाहियात शक्श है जिसने ये कॉपी लिखी है , अल्ला कसम क्या फ़िल्मी शक्शियत है ?
इतने में पंडित राम शंकर जी बोल पड़े - अमां बड़े मियाँ क्यों खामखाँ फडफदाये जा रहे हो? अमां बच्चे ने ऐसा क्या लिख दिया जो पाजामें से बाहर उछल पड़ रहे हो | क्या भाभी जान ने सुबह सुबह ही बेलन बजा डाला है जो उस बेचारे पर लट्ठ लेकर पिल पड़े हो |
अमे पंडित मियाँ ! अबे तुम क्या जानो इस फ़िल्मी शक्श की कारगुजारियां | अल्लाह बचाए ऐसे बच्चो से | अब्दुल मियाँ ने अपने गुस्से का इज़हार किया |
तभी इत्तफाक से सिंह साहब आ गए | उन्हें इस हंगामे की कोई खबर नहीं थी क्यों कि वो बहार चाय समोसे का आर्डर करने गए थे | आते ही उन्होंने सब को अब्दुला सर के पास खड़े देखा तो लपक कर उनके पास खड़े हो गए और कुछ बोलते इससे पहले ही अब्दुल सर ने अपना मुह खोला और तोप के गोले कि तरह शब्द के गोले दागने लगे | आइये जनाब ! वहीँ क्यों रुक गए | हमारे सिर पर काफी जगह खाली है सीधे उसी पर चढ़ जाते | यहाँ मुह के पास आकर क्यों रुक गए | खुदा झूठ न बुलवाए,तुमलोग बेवजह ही हमारे सिर पर क्यों चढ़े जा रहे हो | अबे हमें कुछ हुआ नहीं है , लेकिन तुम लोग तो हद ही कर दिए हो
सिंह साहब अब्दुल सर के बहुत करीबी दोस्तों में से थे
Subscribe to:
Posts (Atom)